PSEB CLASS 10 HINDI POEMS SOLUTION : 10वीं कक्षा - हिंदी कविताएँ (पाठ 1 - 3)

 

हिंदी कविताएँ - पाठ 1 से 3

10वीं कक्षा - हिंदी कविताएँ (पाठ 1 - 3)

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पाठ - 01 (तुलसीदास दोहावली)

श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ।। 1

व्याख्या: तुलसीदास जी लिखते हैं कि अपने गुरु जी के कमल रूपी सुंदर चरणों की धूल से मैं अपने मन के दर्पण को साफ़ करता हूँ और तत्पश्चात् प्रभु राम जी का निर्मल यशगान करता हूँ। ऐसा करने से चारों फल - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं।

राम नाम मनी दीप धरु, जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरु हूँ, जौ चाहसि उजियार ।। 2

व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि मनुष्य अपने मन के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर उजाला करना चाहता है तो राम नाम रूपी मणियों के दीपक को हृदय में धारण करना चाहिए। ऐसा करने से अज्ञान रूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है और ज्ञान रूपी उजाला प्राप्त हो जाता है।

जड़ चेतन गुन दोषमय, बिस्व कीन्ह करतार ।
संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि विकार ।। 3

व्याख्या: तुलसीदास जी लिखते हैं कि ईश्वर ने इस समस्त जड़-चेतन संसार को गुण और दोष से युक्त बनाया है लेकिन संतों में हंस के समान नीर-क्षीर विवेक होता है। इसी विवेक का प्रयोग करके संत दोष रूपी जल को त्याग कर गुण रूपी दूध को ग्रहण करते हैं।

प्रभु तरुवर कपि डार पर, ते किए आपु समान ।
तुलसी कहुँ न राम से, साहिब सील निधान ।। 4

व्याख्या: कवि कहता है कि प्रभु श्रीराम जी बहुत महान और उदार हैं। भगवान श्रीराम स्वयं तो वृक्षों के नीचे रहते थे और बन्दर पेड़ों की डालियों पर रहते थे परन्तु फिर भी ऐसे बंदरों को भी उन्होंने अपने समान बना लिया। ऐसे उदार, शीलनिधान प्रभु श्रीराम जैसे स्वामी दुनिया में अन्यत्र कोई नहीं हैं।

तुलसी ममता राम सों समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुःख, दास भए भव पार ।। 5

व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम में ममता रखनी चाहिए और संसार के सभी प्राणियों के प्रति समता का भाव रखना चाहिए। इससे मनुष्य राग, रोष, दोष, दुः ख आदि से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार श्रीराम का दास होने के कारण व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है।

गिरिजा संत समागम सम, न लाभ कछु आन ।
बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिं वेद पुरान ।। 6

व्याख्या: तुलसीदास जी लिखते हैं कि शिवजी पार्वती जी को संतों के सम्मेलन की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे पार्वती ! संतों के साथ बैठकर उनके विचार सुनने से ज़्यादा लाभकारी कुछ भी नहीं है और परमात्मा की कृपा के बिना संतों की संगति प्राप्त नहीं होती, ऐसा वेद-पुराणों में कहा गया है।

पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे जड़ बिनु आगि।
तुलसी तिन के भाग ते, चलै भलाई भागि ।। 7

व्याख्या: तुलसीदास लिखते हैं कि जो मूर्ख लोग दूसरों के सुख और सम्पति को देखकर ईर्ष्या से जलते रहते हैं, उन लोगों के भाग्य से भलाई स्वयं ही भाग जाती है। तात्पर्य यह है कि दूसरों की प्रगति को देखकर जलने वालों का कभी भी भला नहीं होता।

साहब ते सेवक बड़ो, जो निज धरम सुजान ।
राम बाँध उतरै उदधि, लांघि गए हनुमान ॥ 8

व्याख्या: तुलसीदास लिखते हैं कि वह सेवक तो स्वामी से भी बड़ा होता है जो अपने धर्म का पालन सच्चे मन से करता है। इसी बात को स्पष्ट करते हुए कवि कहते हैं कि स्वामी श्रीराम तो सागर पर पुल बंधने के बाद ही समुद्र पार कर सके परन्तु उनके सेवक हनुमान तो बिना पुल के ही समुद्र को पार गए।

सचिव वैद गुरु तीनि जो, प्रिय बोलहिं भयु आस ।
राज, धर्म, तन तीनि कर, होइ बेगीही नास ।। 9

व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि किसी राजा का मंत्री, वैद्य और गुरु - ये तीनों राज-भय से अथवा किसी लोभ-लालच से उसकी बात निर्विरोध मान लेते हैं अर्थात् उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं तो उसका राज्य , धर्म और शरीर तीनों शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इस लिए ऐसे चापलूस सलाहकारों से बचना चाहिए।

बिनु बिस्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम ।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीवन लह बिश्राम ।। 10

व्याख्या: तुलसीदास लिखते हैं कि सच्चा भक्त भगवान पर अटूट विश्वास रखता है। बिना भगवान पर विश्वास किये प्रभु-कृपा प्राप्त करना संभव ही नहीं है। भगवान राम की कृपा के बिना स्वप्न में भी चैन नहीं मिलता। इस लिए प्रभु श्रीराम पर अखंड विश्वास रखते हुए भक्ति करना ही सब प्रकार से लाभकारी होता है।

पाठ - 02 (मीराबाई - पदावली)

बसौ मेरे नैनन में नंद लाल।
मोहनि मूरति साँवरी सूरति नैना बने बिसाल।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल अरुण तिलक दिये भाल।
अधर सुधारस मुरली राजति उर वैजन्ती माल।
छुद्र घंटिका कटि तट सोभित नूपुर शब्द रसाल।
मीरा प्रभु सन्तन सुखदाई भक्त बछल गोपाल।। (1)

व्याख्या: मीराबाई कहती हैं कि हे नंद के पुत्र श्री कृष्ण, आप मेरी आँखों में बस जाओ। आपकी मन को मोहित करने वाली सुन्दर छवि, साँवली सूरत व बड़ी-बड़ी आँखें हैं। आपने मोर के पंखों का बना मुकुट व मकर की आकृति के कुंडल धारण किये हैं। आपके माथे पर लाल रंग का तिलक शोभा बढ़ा रहा है। आपके होठों पर अमृत के समान मीठी ध्वनि निकालने वाली मुरली है और ह्रदय पर वैजयन्ती माला सुशोभित है। छोटी-छोटी घंटियाँ आपकी कमर पर बंधी हैं, पाँवों में छोटे-छोटे घुँघरू बँधे हैं, जिनकी ध्वनि मन को आकर्षित करती है। मीरा के प्रभु श्री कृष्ण का यह रूप संतों को सुख देने वाला तथा भक्तों की रक्षा करने वाला है।

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु, आपनो ना कोई।
छांड़ि दई कुल की कानि, कहा करै कोई।
संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई।
अँसुअन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल होई।
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर, तारौ अब मोही। (2)

व्याख्या: मीराबाई जी कहती हैं कि गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले श्री कृष्ण ही मेरे अपने हैं- दूसरा कोई मेरा नहीं है। जिनके सिर पर मोर के पंखों का सुन्दर मुकुट है, वही मेरे पति हैं। माता-पिता, भाई, सगा-संबंधी मेरा कोई अपना नहीं है। मैंने कुल की मर्यादा छोड़ दी है- मुझे अब किसी की परवाह नहीं है। सन्तों की संगति में रह कर मैंने लोक लाज को छोड़ दिया है। श्री कृष्ण रूपी प्रेम की बेल को मैंने अपने आँसुओं के जल से सींचा है। अब तो प्रेम की वह बेल खिल गई है और उस पर भक्ति के मीठे-मीठे फल लग गए हैं, जिससे आनन्द की प्राप्ति होगी। मीरा जी कहती हैं कि भक्तों को देखकर उन्हें ख़ुशी मिलती है- संसार का झमेला तो दुःख ही देने वाला है जिसमें रोना-धोना ही है। मीराबाई श्री कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी दासी हैं -अब संसार रूपी समुद्र से उनका उद्धार किया जाए।

पाठ - 03 (नीति के दोहे)

रहीम

कहि रहीम सम्पति सगे, बनत बहुत बहु रीत ।
विपत कसौटी जे कसे, सोई साँचे मीत ।। (1)

व्याख्या: रहीम जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य के पास धन-दौलत, पैसा व संपति रहती है तब तक मनुष्य के बहुत से रिश्तेदार, मित्र व दोस्त होते हैं और वे अनेक प्रकार से मित्र बनने का प्रयास करते हैं। परंतु जो मुसीबत के समय हमारा साथ देता है, विपत्ति की कसौटी पर खरा उतरता है, वही वास्तव में सच्चा मित्र होता है।

एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय ।
रहिमन सींचे मूल को, फूलै फलै अघाय || (2)

व्याख्या: इस दोहे में रहीम जी कहते हैं कि एक की साधना पूरी तरह से करने पर सब साधे जाते हैं अर्थात् अगर हम एक समय में एक काम की तरफ पूर्ण रूप से ध्यान देते हैं तो बाकी सारे काम भी पूरे हो जाते हैं। इसके विपरीत अगर हम सभी कार्य एक साथ करने का प्रयास करते हैं तो सब बेकार हो जाता है। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ को सींचने पर उस पर लगे फल-फूल भी अपने आप तृप्त हो जाते हैं, उन्हें अलग से सींचना नहीं पड़ता। ठीक उसी प्रकार एक समय पर एक काम की ओर ध्यान केंद्रित करने पर बाकी काम भी अच्छे से संपन्न हो जाते हैं।

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहि न पान ।
कहि रहीम पर काज हित, सम्पति संचहि सुजान।। (3)

व्याख्या: इस दोहे में रहीम जी कहते हैं कि पेड़ कभी अपना फल स्वयं नहीं खाता बल्कि अपने फल से दूसरों की भूख मिटाता है। सरोवर अपना पानी स्वयं नहीं पीता बल्कि अपने जल से दूसरों की प्यास बुझाता है। ठीक उसी प्रकार अच्छे और सज्जन व्यक्ति संपति का संचय अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए करते हैं अर्थात् वह अपने द्वारा एकत्र की गई धन-दौलत को दूसरों की भलाई में लगा देते हैं।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, का करे तरवारि ।। (4)

व्याख्या: इस दोहे में रहीम जी कहते हैं कि हमें बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु के महत्व को भूलना नहीं चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे जहाँ पर सुई का काम होता है वहाँ पर तलवार कुछ नहीं कर सकती अर्थात् सुई चाहे आकार में कितनी भी छोटी क्यों न हो परंतु उसका कार्य वही कर सकती है, तलवार जैसी बड़ी चीज भी नहीं। अतः हमें बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु की उपयोगिता को भूलना नहीं चाहिए।

बिहारी

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।
वह खाये बौरात है, यह पाये बौराय II(5)

व्याख्या: इस दोहे में बिहारी जी कहते हैं कि कनक अर्थात् सोने का नशा कनक अर्थात् धतूरे के नशे से सौ गुना अधिक होता है। धतूरे को तो खाने से नशा चढ़ता है परंतु सोना अर्थात् धन-दौलत को प्राप्त करने पर ही मनुष्य को उसका नशा चढ़ जाता है। अर्थात् अधिक धन दौलत का नशा अर्थात् अभिमान मनुष्य को पागल बना देता है।

इहि आसा अटक्यौ रहै, अलि गुलाब के मूल ।
हो इहै बहुरि बसंत ऋतु, इन डारनि पै फूल || (6)

व्याख्या: बिहारी जी कहते हैं कि भँवरा इसी आशा के साथ पतझड़ में भी गुलाब की जड़ व डालियों के आसपास मंडराता रहता है कि बसंत आने पर इन डालियों पर फिर से फूल खिलेंगे और वह उन फूलों का रसपान करेगा। इसी तरह मनुष्य को भी जीवन में निराश न होकर आने वाले अच्छे दिनों के लिए आशावादी बनकर रहना चाहिए।

सोहतु संग समानु सो, यहै कहै सब लोग।
पान पीक ओठनु बनै, नैननु काजर जोग।। (7)

व्याख्या: इस दोहे में बिहारी जी कहते हैं कि एक जैसे स्वभाव और गुणों वाले लोगों का साथ शोभा देता है, ऐसा सब लोग कहते व मानते हैं। जैसे पान का रंग लाल होता है और उसकी लाल रंग की पीक होठों पर ही अच्छी लगती है। काजल का रंग काला होता है और वह आँखों में ही शोभा देता है।

गुनी गुनी सबकै कहैं, निगुनी गुनी न होतु।
सुन्यौ कहाँ तरू अरक तें, अरक- समान उदोतु II (8)

व्याख्या: बिहारी जी कहते हैं कि गुणी-गुणी कहने से कोई गुणहीन व्यक्ति गुणवान नहीं बन जाता। जिस प्रकार सूर्य को अर्क भी कहते हैं और आक का पौधा भी अर्क कहलाता है परंतु अर्क कहलाने मात्र से आक के पौधे में सूर्य के समान गुण नहीं आ जाते। अतः हमें किसी के नाम पर नहीं बल्कि उसके गुणों व योग्यता पर ध्यान देना चाहिए।

वृन्द

करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान ।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान ।। (9)

व्याख्या: वृन्द जी कहते हैं कि लगातार अभ्यास करने से एक मूर्ख व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है। जिस प्रकार रस्सी के बार-बार घिसने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं। अतः लगातार मेहनत करके कमज़ोर व्यक्ति भी अपने लक्ष्य को पा सकता है।

फेर न ह्वै है कपट सों, जो कीजै ब्यापार
जैसे हाँडी काठ की, चढ़ै न दूजी बार ।। (10)

व्याख्या: वृन्द जी कहते हैं कि छल और कपट का व्यवहार बार-बार नहीं चल सकता। इनसे बार-बार व्यापार नहीं किया जा सकता। जैसे लकड़ी की हाँडी को एक ही बार आग पर चढ़ाया जा सकता है दूसरी बार नहीं। अतः छल और कपट का व्यवहार एक ही बार किया जा सकता है, बार-बार नहीं।

मधुर बचन ते जात मिट, उत्तम जन अभिमान
तनिक सीत जल सों मिटे, जैसे दूध उफान ।। (11)

व्याख्या: वृन्द जी कहते हैं कि मीठे वचन बोलने से बड़े से बड़े अभिमानी व्यक्ति का अभिमान भी दूर हो जाता है जैसे दूध में आए उफान को ज़रा से ठंडे जल के छींटे दूर कर देते हैं या शांत कर देते हैं उसी प्रकार मीठे वचनों से किसी के भी घमंड को शांत किया जा सकता है।

अरि छोटो गनिये नहीं, जाते होत बिगार ।
तृण समूह को तनिक में, जारत तनिक अंगार ।। (12)

व्याख्या: वृन्द जी कहते हैं कि कभी भी अपने शत्रु को अपने से छोटा या कमज़ोर नहीं समझना चाहिए क्योंकि कई बार छोटी वस्तुएँ भी बहुत बड़ा बिगाड़ कर देती हैं। जिस प्रकार एक छोटा-सा अंगारा तिनकों के बहुत बड़े समूह को जला देता है। उसी प्रकार छोटा-सा शत्रु भी कई बार बहुत बड़ा नुकसान कर देता है।

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