10वीं कक्षा - हिंदी प्रश्न-उत्तर (पाठ 12 - 15)
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पाठ - 12: मित्रता (आचार्य रामचंद्र शुक्ल)
एक या दो पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. घर से बाहर निकल कर बाहरी संसार में विचरने पर युवाओं के सामने पहली कठिनाई क्या आती है?
उत्तर: घर से बाहर निकल कर बाहरी संसार में विचरने पर युवाओं के सामने पहली कठिनाई मित्र चुनने की आती है।
प्रश्न 2. हमसे अधिक दृढ़ संकल्प वाले लोगों का साथ बुरा क्यों हो सकता है?
उत्तर: ऐसे लोगों का साथ हमारे लिए बुरा है, जो हम से अधिक दृढ़ संकल्प के हैं क्योंकि हमें उनकी हर बात बिना विरोध के मान लेनी पड़ती है।
प्रश्न 3. आजकल लोग दूसरों में कौन-कौन सी दो-चार बातें देखकर चटपट उसे अपना मित्र बना लेते हैं?
उत्तर: आजकल लोग किसी का हँसमुख चेहरा, बातचीत का ढंग, थोड़ी चतुराई या साहस जैसी दो-चार बातें देखकर ही शीघ्रता से उसे अपना मित्र बना लेते हैं।
प्रश्न 4. किस प्रकार के मित्र से भारी रक्षा रहती है?
उत्तर: विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती है क्योंकि जिसे ऐसा मित्र मिल जाए उसे समझना चाहिए कि खज़ाना मिल गया है।
प्रश्न 5. चिंताशील, निर्बल तथा धीर पुरुष किस प्रकार का साथ ढूँढ़ते हैं?
उत्तर: चिंताशील मनुष्य प्रफुल्लित व्यक्ति का, निर्बल पुरुष बली का तथा धीर व्यक्ति उत्साही पुरुष का साथ ढूँढ़ते हैं।
प्रश्न 6. उच्च आकांक्षा वाला चन्द्रगुप्त युक्ति व उपाय के लिए किस का मुँह ताकता था?
उत्तर: उच्च आकांक्षा वाला चंद्रगुप्त युक्ति व उपाय के लिए चाणक्य का मुँह ताकता था।
प्रश्न 7. नीति-विशारद अकबर मन बहलाने के लिए किसकी ओर देखता था?
उत्तर: नीति- विशारद अकबर मन बहलाने के लिए बीरबल की ओर देखता था।
प्रश्न 8. मकदूनिया के बादशाह डेमेट्रियस के पिता को दरवाजे पर कौन सा ज्वर मिला था?
उत्तर: मकदूनिया के बादशाह डेमेट्रियस के पिता को दरवाजे पर मौज मस्ती में बादशाह का साथ देने वाला कुसंगति रूपी एक हँसमुख जवान नामक ज्वर मिला था।
प्रश्न 9. राजदरबार में जगह न मिलने पर इंग्लैंड का एक विद्वान अपने भाग्य को क्यों सराहता रहा?
उत्तर: क्योंकि उसे लगता था कि राजदरबारी बन कर वह बुरे लोगों की संगति में पड़ जाता जिससे वह आध्यात्मिक उन्नति न कर पाता। बुरी संगति से बचने के कारण वह अपने आप को सौभाग्यशाली मानता रहा।
प्रश्न 10. हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय क्या है?
उत्तर: हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय स्वयं को बुरी संगति से दूर रखना है।
तीन या चार पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. विश्वासपात्र मित्र को खज़ाना, औषध और माता जैसा क्यों कहा गया है?
उत्तर: लेखक ने विश्वासपात्र मित्र को खज़ाना इसलिए कहा है क्योंकि जैसे खज़ाना मिलने से सभी प्रकार की कमियाँ दूर हो जाती हैं उसी प्रकार से विश्वासपात्र मित्र मिलने से सभी कमियां दूर हो जाती हैं। वह एक औषध के समान हमारी बुराइयों रूपी बीमारियों को ठीक कर देता है। वह माता के समान धैर्य और कोमलता से स्नेह देता है।
प्रश्न 2. अपने से अधिक आत्मबल रखने वाले व्यक्ति को मित्र बनाने से क्या लाभ है?
उत्तर: हमें अपने से अधिक आत्मबल रखने वाले व्यक्ति को अपना मित्र बनाना चाहिए। ऐसा व्यक्ति हमें उच्च और महान कार्यों को करने में सहायता देता है। वह हमारा मनोबल और साहस बढ़ाता है। उसकी प्रेरणा से हम अपनी शक्ति से अधिक कार्य कर लेते हैं। जैसे सुग्रीव ने श्री राम से मित्रता की थी। श्री राम से प्रेरणा प्राप्त कर उसने अपने से अधिक बलवान बाली से युद्ध किया था। ऐसे मित्रों के भरोसे से हम कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से कर लेते हैं।
प्रश्न 3. लेखक ने युवाओं के लिए कुसंगति और सत्संगति की तुलना किससे की और क्यों?
उत्तर: सत्संगति से हमारा जीवन सफल होता है। सत्संगति सहारा देने वाली ऐसी बाहु के समान होती है जो हमें निरंतर उन्नति की ओर उठाती जाती है। कुसंगति के कारण हमारा जीवन नष्ट हो जाता है। कुसंगति पैरों में बंधी हुई चक्की के समान होती है जो हमें निरंतर अवनति के गड्ढे में गिराती जाती है।
छह या सात पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. सच्चे मित्र के कौन-कौन से गुण लेखक ने बताएं हैं?
उत्तर: लेखक के अनुसार सच्चा मित्र पथ-प्रदर्शक के समान होता है, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकते हैं। वह हमारे भाई जैसा होता है, जिसे हम अपना प्रीति पात्र बना सकते हैं। सच्चे मित्र में निपुणता, अच्छी से अच्छी माता-सा धैर्य और कोमलता होती है। सच्चा मित्र हमारी बहुत रक्षा करता है। वैद्य-सा सच्चा मित्र हमें संकल्पों में दृढ़ करता है, दोषों से बचाता है तथा उत्तमतापूर्वक जीवन निर्वाह करने में हर प्रकार से सहायता देता है।
प्रश्न 2. बाल्यावस्था और युवावस्था की मित्रता के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: बाल्यावस्था की मित्रता में एक मग्न करने वाला आनंद होता है। इसमें मन को प्रभावित करने वाली ईर्ष्या और खिन्नता का भाव भी होता है। इसमें बहुत अधिक मधुरता, प्रेम और विश्वास भी होता है। जल्दी ही रूठना और मनाना भी होता है। युवावस्था की मित्रता बाल्यावस्था की मित्रता की अपेक्षा अधिक दृढ़, शांत और गंभीर होती है। युवावस्था का मित्र सच्चे पथ प्रदर्शक के समान होता है।
प्रश्न 3. 'दो भिन्न प्रकृति के लोगों में परस्पर प्रीति और मित्रता बनी रहती है'- उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह आवश्यक नहीं है कि मित्रता एक ही प्रकार के स्वभाव तथा कार्य करने वाले लोगों में हो। मित्रता भिन्न प्रकृति, स्वभाव और व्यवसाय के लोगों में भी हो जाती है जैसे मुग़ल सम्राट अकबर और बीरबल भिन्न स्वभाव के होते हुए भी मित्र थे। अकबर नीति विशारद तथा बीरबल हंसोड़ व्यक्ति थे। इसी प्रकार से धीर और शांत स्वभाव के राम और उग्र स्वभाव के लक्ष्मण में भी गहरी मित्रता थी।
प्रश्न 4. मित्र का चुनाव करते समय हमें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: मित्र बनाते समय ध्यान रखना चाहिए कि वह हमसे अधिक दृढ़ संकल्प का न हो क्योंकि ऐसे व्यक्तियों की हर बात हमें बिना विरोध के माननी पड़ती है। वह हमारी हर बात को मानने वाला भी नहीं होना चाहिए क्योंकि तब हमारे ऊपर कोई नियंत्रण नहीं रहता। केवल हँसमुख चेहरा, बातचीत का ढंग, चतुराई आदि देखकर भी किसी को मित्र नहीं बनाना चाहिए। उसके गुणों तथा स्वभाव की परीक्षा करके ही मित्र बनाना चाहिए। वह हमें जीवन संग्राम में सहायता देने वाला होना चाहिए। केवल छोटे-मोटे काम निकालने के लिए किसी से मित्रता न करें। मित्र तो सच्चे पथ प्रदर्शक के समान होना चाहिए।
प्रश्न 5. 'बुराई अटल भाव धारण करके बैठती है।' क्या आप लेखक की इस उक्ति से सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक का यह कथन पूरी तरह से सही है कि बुराई हमारे मन में अटल भाव धारण करके बैठ जाती है। भद्दे और फूहड़ गीत हमें बहुत जल्दी याद हो जाते हैं। अच्छी और गंभीर बात जल्दी समझ में नहीं आती। इसी प्रकार से बचपन में सुनी अथवा कही हुई गंदी गालियाँ कभी नहीं भूलतीं। ऐसे ही जिस व्यक्ति को कोई बुरी लत लग जाती है, जैसे सिगरेट, शराब आदि पीना, तो उसकी वह बुरी आदत भी आसानी से नहीं छूटती। कोई व्यक्ति हमें गंदे चुटकुले आदि सुनाकर हँसाता है तो हमें बहुत अच्छा लगता है। इस प्रकार बुरी बातें सहज ही हमारे मन में प्रवेश कर जाती हैं।
पाठ - 13: मैं और मेरा देश (कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर')
एक या दो पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. लेखक को अपनी पूर्णता का बोध कब हुआ?
उत्तर: जब लेखक को यह पता चला कि उसे बहुतों की अपने लिए ज़रूरत पड़ती है और वह भी बहुतों की ज़रूरतों को पूरा करता है, तब उसे अपनी पूर्णता का बोध हुआ।
प्रश्न 2. मानसिक भूकम्प से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: मानसिक विचारों और विश्वासों में हलचल उत्पन्न होना ही मानसिक भूकम्प कहलाता है, जिससे मन में अनेक विचार आंदोलित होने लगते हैं।
प्रश्न 3. किस तेजस्वी पुरुष के अनुभव ने लेखक को हिला दिया?
उत्तर: स्वर्गीय पंजाब केसरी लाला लाजपत राय जी के विदेश यात्रा के दौरान भारत वर्ष की गुलामी की लज्जा के कलंक के अनुभव ने लेखक को हिला दिया।
प्रश्न 4. मनुष्य के लिए संसार के सारे उपहारों और साधनों को व्यर्थ क्यों कहा?
उत्तर: मनुष्य के लिए संसार के सभी उपहार और साधन तब व्यर्थ हो जाते हैं जब उसका देश गुलाम हो या किसी भी अन्य रूप से हीन हो।
प्रश्न 5. युद्ध में ‘जय’ बोलने वालों का क्या महत्व है?
उत्तर: युद्ध क्षेत्र में लड़ने के अतिरिक्त ‘जय’ बोलने वाले भी सैनिकों का साहस और उत्साह बढ़ाने का कार्य करते हैं।
प्रश्न 6. दर्शकों की तालियाँ खिलाड़ियों पर क्या प्रभाव डालतीं हैं?
उत्तर: दर्शकों की तालियों से खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है और गिरते खिलाड़ी भी उभर जाते हैं।
प्रश्न 7. जापान के स्टेशन पर स्वामी रामतीर्थ क्या ढूँढ रहे थे?
उत्तर: जापान के स्टेशन पर स्वामी रामतीर्थ ताजे फल ढूँढ रहे थे।
प्रश्न 8. कमालपाशा कौन थे?
उत्तर: कमालपाशा तुर्की के राष्ट्रपति थे।
प्रश्न 9. बूढ़े किसान ने कमालपाशा को क्या उपहार दिया?
उत्तर: बूढ़े किसान ने कमालपाशा को मिट्टी की छोटी-सी हंडिया में पाव भर शहद उपहार में दिया।
प्रश्न 10. किसान ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को क्या उपहार दिया?
उत्तर: किसान ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को रंगीन सुतलियों से बनी एक खाट उपहार में दी।
प्रश्न 11. लेखक के अनुसार हमारे देश को किन दो बातों की आवश्यकता है?
उत्तर: लेखक के अनुसार हमारे देश को - शक्तिबोध और सौंदर्यबोध इन दो बातों की आवश्यकता है।
प्रश्न 12. शल्य कौन था?
उत्तर: शल्य महाबली कर्ण का सारथी, माद्री का भाई और नकुल सहदेव का मामा था।
तीन या चार पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. लाला लाजपत राय के किस अनुभव ने लेखक की पूर्णता को अपूर्णता में बदल दिया?
उत्तर: लाला लाजपत राय जी सारे संसार में घूमे थे। संसार के देशों में घूम कर जब वे अपने देश लौटे तो उन्होंने अपनी विदेश यात्रा का अनुभव सुनाते हुए कहा कि वे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और संसार के अनेक देशों में घूमे परंतु जहाँ भी गए वहाँ भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक उनके माथे पर लगा ही रहा। उनके इसी अनुभव ने लेखक की पूर्णता को अपूर्णता में बदल दिया था।
प्रश्न 2. स्वामी रामतीर्थ द्वारा फलों की टोकरी का मूल्य पूछने पर जापानी युवक ने क्या कहा?
उत्तर: एक बार स्वामी रामतीर्थ जापान के स्टेशन पर ताज़े फल ढूँढ रहे थे और फल न मिलने पर उन्होंने कहा कि शायद जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। तभी एक जापानी युवक जो कि अपनी पत्नी को रेल में बैठाने आया था, ने उनकी यह बात सुन ली। तभी वह कहीं दूर से एक टोकरी ताज़े फल लाया और स्वामी जी को भेंट करते हुए कहा कि लीजिए, आपको ताज़े फलों की ज़रूरत थी। स्वामी जी ने उसे फल बेचने वाला समझकर उनका दाम देना चाहा तो उसने स्वामी जी से कहा कि यदि आप इनका मूल्य मुझे देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।
प्रश्न 3. किसी देश के विद्यार्थी ने जापान में ऐसा कौन-सा काम किया जिससे उसके देश के माथे पर कलंक का टीका लग गया?
उत्तर: किसी देश का एक युवक जापान में शिक्षा लेने आया। एक दिन वह सरकारी पुस्तकालय से पुस्तक पढ़ने को लाया। उस पुस्तक में कुछ दुर्लभ चित्र थे। उस युवक ने पुस्तक में से वे चित्र निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया। किसी जापानी विद्यार्थी ने यह देख लिया और पुस्तकालय को इसकी सूचना दे दी। पुलिस ने तलाशी लेकर वे चित्र उस विद्यार्थी के कमरे से बरामद किए और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया और साथ ही पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिखवा दिया गया कि जिस देश का भी वह विद्यार्थी था उसका कोई भी निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। इस प्रकार उसने अपने काम से अपने देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगा दिया।
प्रश्न 4. लेखक के अनुसार कोई भी कार्य महान कैसे बन जाता है?
उत्तर: लेखक के अनुसार महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, बल्कि उस कार्य को करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है और छोटे से छोटा कार्य भी महान बन जाता है यदि उसको करने के पीछे अच्छी भावना है।
प्रश्न 5. शल्य ने कौन-सा महत्वपूर्ण कार्य किया? पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर: शल्य महाबली कर्ण का सारथी था। जब भी कर्ण अपने पक्ष की विजय की घोषणा करता तो शल्य अर्जुन की अजेयता का हल्का-सा उल्लेख कर देता। बार-बार इस उल्लेख से कर्ण के आत्मविश्वास में कमी आ गई। इसी कमी के कारण वह अर्जुन से पराजित हुआ।
प्रश्न 6. शक्ति बोध और सौंदर्य बोध से क्या तात्पर्य है? पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: शक्ति बोध का अर्थ देश को शक्तिशाली बनाने और शक्ति के ज्ञान से है। जब हम यह समझ लें कि हमारा कोई भी काम ऐसा न हो जो देश में कमजोरी की भावना को बल दे और हम अपने देश को दूसरों से श्रेष्ठ बनाने की कोशिश करें तो हम अपने देश को शक्तिशाली बनाते हैं। सौंदर्य बोध का अर्थ देश को सुंदर बनाने से है। जब हम यह समझ लें कि हमारे किसी भी काम से देश में कुरुचि की भावना पैदा न हो और देश की सुंदरता को कोई चोट न पहुँचे तो हम अपने देश को सुंदर बनाते हैं।
प्रश्न 7. हम अपने देश के शक्ति बोध को किस प्रकार चोट पहुँचाते है?
उत्तर: जब हम रेलों, मुसाफिरखानों, क्लबों, चौपालों, मोटर बसों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अपने देश की खामियों का वर्णन करते हैं और दूसरे देश की खुशहाली की प्रशंसा करते हैं। अपने देश की दूसरे देशों के साथ तुलना करते हुए अपने देश को हीन और दूसरे देशों को श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं तो ऐसा करके हम अपने देश के शक्ति बोध को भयंकर चोट पहुँचाते हैं और स्वयं अपने ही देश के सामूहिक मानसिक बल को हीन कर देते हैं।
प्रश्न 8. हम अपने देश के सौन्दर्य बोध को किस प्रकार चोट पहुँचाते हैं?
उत्तर: जब हम केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं, घर का कूड़ा बाहर फेंकते हैं, मुँह से गंदे शब्दों से गंदे भाव प्रकट करते हैं, इधर की उधर, उधर की इधर लगाते हैं, अपना घर, दफ्तर, गली गंदा रखते हैं, होटलों, धर्मशालाओं या दूसरे स्थानों में, जीनों में, कोनों में पीक थूकते हैं। उत्सवों, मेलों, रेलों और खेलों में ठेलमठेल करते हैं, निमंत्रित होने पर समय से लेट पहुँचते हैं, वचन देकर भी घर आने वालों को समय पर नहीं मिलते, ऐसा सब करके हम अपने देश की संस्कृति और सौंदर्य बोध को चोट पहुँचाते हैं।
प्रश्न 9. देश की उच्चता और हीनता की कसौटी क्या है?
उत्तर: देश की उच्चता और हीनता की कसौटी चुनाव है। जिस देश के नागरिक यह समझते हैं कि चुनाव में किसे अपना मत देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश उच्च है और जहाँ के नागरिक गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर मत देते हैं, वह देश हीन है।
छह या सात पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. लाला लाजपत राय जी ने देश के लिए कौन-सा महत्वपूर्ण कार्य किया? निबंध के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर: लाला लाजपत राय जी देश के स्वतंत्रता सेनानियों में से प्रमुख थे। उन्होंने देश की पराधीन स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए अनेक लेख लिखे। उन्होंने अपने लेखों और वाणी से देश के लोगों के अंदर स्वतंत्रता पाने के लिए जोश पैदा किया। वे संसार भर के देशों में घूमे। परंतु जहाँ भी गए भारत देश की गुलामी की लज्जा का कलंक होने के कारण मन ही मन बहुत दु:खी हुए। वे एक अद्भुत व्यक्तित्व वाले मनुष्य थे। जिससे भी मिलते थे, उस पर छा जाते थे। उनकी कलम और वाणी में तेजस्विता की ऐसी किरणें थीं जिससे अपने मुग्ध हो जाते थे और पराए भौचंक। उन्होंने भारतीयों को अंग्रेज़ों की गुलामी के कलंक से छुटकारा पाने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति में विशेष भूमिका निभाई।
प्रश्न 2. तुर्की के राष्ट्रपति कमाल पाशा और भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित घटनाओं द्वारा लेखक क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर: तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा को उनकी वर्षगाँठ के अवसर पर एक बूढ़े किसान ने मिट्टी की छोटी-सी हंडिया में पाव-भर शहद उपहार में दिया, जिसे कमालपाशा ने उस दिन का सर्वोत्तम उपहार कहा। ठीक उसी प्रकार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक किसान ने रंगीन सुतलियों से बुनी खाट भेंट की जिसे देख कर पंडित जी भाव-विभोर हो गए थे। ये दोनों ही उपहार कोई विशेष या बहुत कीमती नहीं थे परंतु इन उपहारों को देने वाले भेंटकर्ताओं की भावना अच्छी और सच्ची थी जिसने उन साधारण से उपहारों को भी कीमती बना दिया। इस प्रकार इन घटनाओं से लेखक यही संदेश देना चाहता है कि महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं बल्कि उस कार्य को करने की भावना में है।
प्रश्न 3. लेखक ने देश के नागरिकों को चुनावों में किन बातों की ओर ध्यान देने के लिए कहा है?
उत्तर: लेखक ने देश की उच्चता और हीनता की कसौटी चुनाव को कहा है। इसीलिए उसके अनुसार देश के प्रत्येक नागरिक को अपने मताधिकार का सही प्रयोग करना चाहिए। किसी भी नागरिक को गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर मत नहीं देना चाहिए। देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि जब भी कोई चुनाव हो तो व्यक्ति विशेष के गुण-दोषों को विचार कर ठीक मनुष्य को ही अपना मत देना चाहिए न कि किसी लालच में आकर। तभी कोई देश उच्च बन सकता है।
पाठ - 14: राजेन्द्र बाबू (महादेवी वर्मा)
एक या दो पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. राजेंद्र बाबू को लेखिका ने प्रथम बार कहाँ देखा था?
उत्तर: राजेंद्र बाबू को लेखिका ने प्रथम बार पटना स्टेशन पर देखा था।
प्रश्न 2. राजेंद्र बाबू अपने स्वभाव और रहन-सहन में किसका प्रतिनिधित्व करते थे?
उत्तर: राजेंद्र बाबू अपने स्वभाव और रहन-सहन में एक साधारण भारतीय कृषक का प्रतिनिधित्व करते थे।
प्रश्न 3. राजेंद्र बाबू के निजी सचिव और सहचर कौन थे?
उत्तर: राजेंद्र बाबू के निजी सचिव और सहचर भाई चक्रधर थे।
प्रश्न 4. राजेंद्र बाबू ने किनकी शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए लेखिका से अनुरोध किया?
उत्तर: राजेंद्र बाबू ने लेखिका से अपनी 15-16 पोतियों की शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए अनुरोध किया।
प्रश्न 5. लेखिका प्रयाग से कौन-सा उपहार लेकर राष्ट्रपति भवन पहुँची थीं?
उत्तर: लेखिका प्रयाग से सिरकी के बने बारह सूपों का उपहार लेकर राष्ट्रपति भवन पहुँची थीं।
प्रश्न 6. राष्ट्रपति को उपवास की समाप्ति पर क्या खाते देख कर लेखिका को हैरानी हुई?
उत्तर: राष्ट्रपति को उपवास की समाप्ति पर उबले आलू खाते देखकर लेखिका को हैरानी हुई।
तीन या चार पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. राजेंद्र बाबू को देखकर हर किसी को यह क्यों लगता था कि उन्हें पहले कहीं देखा है?
उत्तर: राजेंद्र बाबू की आकृति और उनके शरीर का गठन एक सामान्य भारतीय की तरह था। उनकी वेशभूषा भी एक आम व्यक्ति के समान थी। उनका स्वभाव तथा रहन-सहन भी एक सामान्य भारतीय या भारतीय किसान के समान था। इसलिए उन्हें जो भी देखता था उसे ऐसा ही लगता था कि उन्हें पहले कहीं देखा है।
प्रश्न 2. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अस्त-व्यस्तता तथा राजेंद्र बाबू की सारी व्यवस्था किसका पर्याय थी?
उत्तर: पंडित जवाहरलाल नेहरु जी की अस्त-व्यस्तता भी व्यवस्था से निर्मित होती थी किंतु राजेंद्र बाबू की सारी व्यवस्था ही अस्त-व्यस्तता से परिपूर्ण थी। अर्थात् जवाहरलाल नेहरू जी का सारा कार्य अस्त-व्यस्त होने पर भी व्यवस्थित दिखाई देता था और राजेंद्र बाबू का सारा काम व्यवस्थित होता था, ठीक होता था परंतु देखने में अस्त-व्यस्त दिखाई देता था और जब भी कोई उनकी अस्त-व्यस्तता देख लेता था तो वे एक बालक की भांति सकुचा जाते थे।
प्रश्न 3. राजेंद्र बाबू की वेशभूषा के साथ उनके निजी सचिव और सहचर चक्रधर बाबू का स्मरण लेखिका को क्यों हो आया?
उत्तर: राजेंद्र बाबू की वेशभूषा के साथ उनके निजी सचिव और सहचर चक्रधर बाबू का स्मरण लेखिका को इसलिए हो आया क्योंकि चक्रधर बाबू भी तब तक अपने मोज़े तथा जूते नहीं बदलते थे जब तक मोज़ों से पाँचों उंगलियाँ बाहर नहीं निकलने लगतीं थीं। जूतों के तलवों में सुराख नहीं हो जाते थे। वे अपने वस्त्र भी जीर्ण-शीर्ण हो जाने तक नहीं बदलते थे। वे राजेंद्र बाबू के पुराने वस्त्रों को पहनकर वर्षों उनकी सेवा करते रहे।
प्रश्न 4. लेखिका ने राजेंद्र बाबू की पत्नी को सच्चे अर्थों में धरती की पुत्री क्यों कहा है?
उत्तर: राजेंद्र बाबू की पत्नी बहुत ही सरल, क्षमामयी तथा त्याग-भावना वाली स्त्री थीं। बिहार के ज़मींदार परिवार की बहू और भारत के प्रथम राष्ट्रपति की पत्नी होने पर भी उन्हें कोई अहंकार नहीं था। वे सभी का ध्यान रखती थीं। वे बहुत ही विनम्र स्वभाव की थीं। इसीलिए लेखिका ने उन्हें सच्चे अर्थों में धरती की पुत्री कहा है।
प्रश्न 5. राजेंद्र बाबू की पोतियों का छात्रावास में रहन-सहन कैसा था?
उत्तर: राजेंद्र बाबू की पोतियाँ अन्य सामान्य बालिकाओं के समान छात्रावास में बहुत ही सादगी और संयम से रहती थीं। खादी के कपड़े पहनती थीं और स्वयं ही उन्हें धोती थीं। उनके साबुन, तेल आदि का खर्च भी सीमित था। कमरे की सफाई और झाड़-पोंछ भी वे स्वयं करती थीं। गुरुजनों की सेवा भी करती थीं।
प्रश्न 6. राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी राजेंद्र बाबू और उनकी पत्नी में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ - उदाहरण देकर स्पष्ट करें।
उत्तर: यह बात बिल्कुल ठीक है कि राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी राजेंद्र बाबू और उनकी पत्नी में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ, उदाहरण के तौर पर अपनी पोतियों के संबंध में उन्होंने लेखिका से कहा था कि उनकी पोतियाँ अब तक जैसे रहती आई हैं अब भी वैसे ही रहेंगी। उनकी पत्नी पहले की तरह ही स्वयं भोजन बनाकर पति, परिवार और परिजनों को खिलाने के बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करती थीं। उपवास की समाप्ति पर भी वे फल व मिठाइयों आदि के स्थान पर उबले हुए आलू खाते थे।
छह या सात पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. राजेंद्र बाबू की शारीरिक बनावट, वेशभूषा और स्वभाव का वर्णन करें।
उत्तर: राजेंद्र बाबू के बाल काले, घने और छोटे थे। उनका चौड़ा मुख, चौड़ा माथा, बड़ी-बड़ी आँखें, कुछ भारी नाक, गोलाई लिए चौड़ी ठुड्डी और सुडौल होंठ थे। उनका रंग गेहुँआ था। ग्रामीणों के जैसी बड़ी बड़ी मूँछें थीं। उनके हाथ, पैर और शरीर में लंबाई की विशेषता थी। वे खादी की मोटी धोती-कुर्ता, काला बंद गले का कोट, गाँधी टोपी, साधारण मोज़े और जूते पहनते थे। उनका स्वभाव बहुत ही शांत था। वे सदा सादगी पसंद करते थे। उनका खान-पान भी साधारण था। वे अपने स्वभाव और रहन-सहन में एक भारतीय किसान के समान थे।
प्रश्न 2. पाठ के आधार पर राजेंद्र बाबू की पत्नी की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर: राजेंद्र बाबू की पत्नी एक सच्ची भारतीय नारी थी। वे धरती के समान सहनशील, क्षमामयी, त्याग भावना वाली व ममतामयी थीं। उनका विवाह बचपन में ही हो गया था। घंटों सिर नीचा करके बैठने के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी इतनी झुक गई थी कि वे सीधी खड़ी नहीं हो पाती थीं। बिहार के ज़मींदार परिवार की बहू और भारत के प्रथम राष्ट्रपति की पत्नी होने का उन्हें कोई अहंकार नहीं था। वे राष्ट्रपति भवन में भी स्वयं भोजन बनाती थीं तथा पति, परिवार व परिजनों को खिलाकर ही स्वयं अन्न ग्रहण करती थीं। छात्रावास में अपनी पोतियों से मिलने जाने पर वह अपनी पोतियों के अतिरिक्त सभी में मिठाई बराबर बाँट देती थीं। गंगा स्नान के समय भी खूब दान करती थीं। वे सच्चे अर्थों में धरती की पुत्री थीं।
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) सत्य में जैसे कुछ घटाना या जोड़ना संभव नहीं रहता वैसे ही सच्चे व्यक्तित्व में कुछ भी जोड़ना-घटाना संभव नहीं है।
उत्तर: प्रस्तुत कथन लेखिका महादेवी वर्मा ने राजेंद्र बाबू के संबंध में कहा है। उनके अनुसार जिस प्रकार सच में कुछ भी जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता क्योंकि सच अपने आप में पूरा होता है, ठीक उसी प्रकार राजेंद्र बाबू जैसे सच्चे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति में भी कुछ कम या अधिक नहीं किया जा सकता, न ही उसकी आवश्यकता होती है क्योंकि सच्चा व्यक्तित्व अपने आप में पवित्र और पूरा होता है।
(ख) क्या वह सांचा टूट गया जिसमें ऐसे कठिन कोमल चरित्र ढलते थे।
उत्तर: लेखिका महादेवी वर्मा ने यह कथन राजेंद्र बाबू जैसे सच्चे चरित्र वाले व्यक्ति को अपने समक्ष रखते हुए कहा है और उन्होंने राजेंद्र बाबू की तुलना आज के नेताओं से करते हुए चिंता भी व्यक्त की है। लेखिका प्रश्न करते हुए कहती हैं कि क्या ईश्वर के पास से वह सांचा टूट गया है जिसमें ढालकर भगवान ने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसे उच्च व पवित्र व्यक्तित्व वाले चरित्र का निर्माण किया था क्योंकि आजकल के नेताओं में राजेंद्र बाबू जैसी मधुरता, निश्चलता, सरलता और सौम्यता कहीं भी दिखाई नहीं देती।
पाठ - 15: सदाचार का तावीज़ (हरिशंकर परसाई)
एक या दो पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. राजा ने राज्य में किस चीज़ के फैलने की बात दरबारियों से पूछी?
उत्तर: राजा ने राज्य में भ्रष्टाचार फैलने की बात दरबारियों से पूछी।
प्रश्न 2. राजा ने भ्रष्टाचार ढूँढने का काम किसे सौंपा?
उत्तर: राजा ने भ्रष्टाचार ढूँढने का काम विशेषज्ञों को सौंपा।
प्रश्न 3. एक दिन दरबारियों ने राजा के सामने किसे पेश किया?
उत्तर: एक दिन दरबारियों ने राजा के सामने एक साधु को पेश किया।
प्रश्न 4. साधु ने राजा को कौन-सी वस्तु दिखायी?
उत्तर: साधु ने राजा को एक तावीज़ दिखाया।
प्रश्न 5. साधु ने तावीज़ का प्रयोग किस पर किया?
उत्तर: साधु ने तावीज़ का प्रयोग एक कुत्ते पर किया।
प्रश्न 6. तावीज़ों को बनाने का ठेका किसे दिया गया?
उत्तर: तावीज़ों को बनाने का ठेका साधु बाबा को दिया गया।
प्रश्न 7. राजा वेश बदलकर पहली बार कार्यालय कब गए थे?
उत्तर: राजा वेश बदलकर पहली बार 2 तारीख को कार्यालय गए थे।
प्रश्न 8. साधु को तावीज़ बनाने के लिए कितनी पेशगी दी गई?
उत्तर: साधु को तावीज़ बनाने के लिए 5 करोड़ रुपए की पेशगी दी गई।
तीन या चार पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. दरबारियों ने भ्रष्टाचार न दिखने का क्या कारण बताया?
उत्तर: दरबारियों ने भ्रष्टाचार न दिखाई देने का कारण बताते हुए कहा कि वह बहुत बारीक होता है और उनकी आँखों को तो महाराज की विराटता देखने की आदत हो गई है। इसलिए उन्हें बारीक चीज नहीं दिखती। यदि उन्हें भ्रष्टाचार दिखा भी तो उसमें उन्हें महाराज की ही छवि दिखेगी क्योंकि उनकी आँखों में तो केवल महाराज की ही सूरत बसी हुई है। अतः ऐसी स्थिति में उनके लिए किसी और वस्तु को देख पाना संभव नहीं है।
प्रश्न 2. राजा ने भ्रष्टाचार की तुलना ईश्वर से क्यों की?
उत्तर: जब विशेषज्ञों ने राजा को भ्रष्टाचार के बारे में बताते हुए कहा कि वह हाथ की पकड़ में नहीं आता। वह स्थूल नहीं सूक्ष्म है, अगोचर है पर सर्वत्र व्याप्त है, उसे देखा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। तब उनकी बातें सुनकर राजा सोच में पड़ गए और बोले कि ये सभी गुण तो ईश्वर में होते हैं। तब इन सभी गुणों के बारे में सुनकर उन्होंने भ्रष्टाचार की तुलना ईश्वर से की।
प्रश्न 3. राजा का स्वास्थ्य क्यों बिगड़ता जा रहा था?
उत्तर: राजा अपने राज्य में फैले भ्रष्टाचार से बहुत परेशान थे। विशेषज्ञों ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक बहुत बड़ी योजना तैयार कर के राजा के आगे रख दी थी। जिस को लागू करना बहुत मुश्किल था। सारी व्यवस्था उलट-पुलट हो जानी थी। जिससे और नई-नई कठिनाइयां पैदा हो सकती थीं। इसलिए भ्रष्टाचार का कोई हल न दिखाई देने के कारण राजा चिंतित रहने लगे और राजा का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा।
प्रश्न 4. साधु ने सदाचार और भ्रष्टाचार के बारे में क्या कहा?
उत्तर: साधु ने सदाचार और भ्रष्टाचार के बारे में बताते हुए कहा कि ये दोनों मनुष्य की आत्मा में ही होते हैं। जब ईश्वर मनुष्य को बनाता है तब किसी की आत्मा में ईमान की कल फिट कर देता है तो किसी की आत्मा में बेईमानी की। इस कल में से ईमान या बेईमानी के स्वर निकलते रहते हैं जिसे 'आत्मा की पुकार' कहते हैं। इसी आत्मा की पुकार के अनुसार आदमी काम करता है।
प्रश्न 5. तावीज़ किस लिए बनवाए गए थे?
उत्तर: राजा ने अपने राज्य में हर जगह फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए तावीज़ बनवाए क्योंकि साधु बाबा के अनुसार जिस आदमी की भुजा पर यह तावीज़ बँधा होगा वह सदाचारी हो जाएगा। उसने एक कुत्ते पर इसका प्रयोग भी किया था। यह तावीज़ गले में बाँधने पर कुत्ता भी रोटी नहीं चुराता था। इसलिए तावीज़ की यह विशेषताएँ सुनकर राजा ने साधु को करोड़ों तावीज़ बनाने के लिए कहा ताकि राज्य के प्रत्येक सरकारी कर्मचारी की भुजा पर इसे बाँधा जा सके और भ्रष्टाचार को रोका जा सके।
प्रश्न 6. महीने के आखिरी दिन तावीज़ में से कौन-से स्वर निकल रहे थे?
उत्तर: महीने के आखिरी दिन जब राजा वेश बदलकर तावीज़ का प्रभाव देखने के लिए एक कर्मचारी के पास गए और उसे 5 रुपये का नोट दिखाया तो उस कर्मचारी ने नोट लेकर अपनी जेब में रख लिया। राजा ने तभी उसका हाथ पकड़ लिया और पूछा कि क्या तुम आज सदाचार का तावीज़ बाँधकर नहीं आए। कर्मचारी ने अपनी आस्तीन चढ़ाकर राजा को तावीज़ दिखा दिया। राजा असमंजस में पड़ गए। उन्होंने तावीज़ पर कान लगाकर सुना तो तावीज़ में से स्वर निकल रहे थे, “अरे ! आज इकतीस है। आज तो ले ले।”
छह या सात पंक्तियों में उत्तर
प्रश्न 1. विशेषज्ञों ने भ्रष्टाचार खत्म करने के क्या-क्या उपाय बताए?
उत्तर: विशेषज्ञों ने भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए एक योजना तैयार की जिसके अनुसार व्यवस्था में कई परिवर्तन करने और भ्रष्टाचार के मौके मिटाने को कहा। उन्होंने ठेका प्रथा को समाप्त करने के लिए कहा क्योंकि यदि ठेके हैं तो ठेकेदार हैं, ठेकेदार हैं तो अधिकारियों को घूस है, ठेका मिट जाए तो उनकी घूस भी मिट जाएगी। उन्होंने कहा कि हमें यह भी पता लगाना होगा कि आदमी किन कारणों से घूस लेता या देता है ताकि उन कारणों को ही समाप्त किया जा सके।
प्रश्न 2. साधु ने तावीज़ के क्या गुण बताए?
उत्तर: साधु ने तावीज़ के गुण बताते हुए कहा कि उसने कई वर्षों के चिंतन के बाद इस तावीज़ को बनाया है। यह मंत्रों से सिद्ध है, जिस आदमी की भुजा पर बाँधा जाता है, वह सदाचार के रास्ते पर चल पड़ता है। साधु ने इस तावीज़ का प्रयोग एक कुत्ते पर भी किया था। यह तावीज़ गले में बाँध देने से कुत्ता भी रोटी नहीं चुराता क्योंकि इस तावीज़ में से सदाचार के स्वर निकलते हैं, जब किसी की आत्मा बेईमानी के स्वर निकालने लगती है तब इस तावीज़ की शक्ति आत्मा का गला घोंटती है और आदमी को तावीज़ से ईमान के स्वर सुनाई पड़ते हैं। वह इन स्वरों को आत्मा की पुकार समझकर सदाचार की ओर प्रेरित होता है और उसका आचरण शुद्ध और पवित्र हो जाता है।
प्रश्न 3. 'सदाचार का तावीज़' पाठ में छिपे व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'सदाचार का तावीज़' 'हरिशंकर परसाई’ जी द्वारा रचित एक व्यंग्यात्मक रचना है जिसमें देशभर में फैले भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कसा गया है। इसमें लेखक दिखाते हैं कि हम एक ऐसी व्यवस्था में रह रहे हैं जिसमें भ्रष्टाचार को दूर करने के उपायों में भी भ्रष्टाचार के अवसर ढूँढ़ लिए जाते हैं। केवल भाषणों, नैतिक स्लोगनों, पुलिसिया कार्यवाही, वाद-विवाद आदि से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपना नैतिक स्तर दृढ़ करना होगा। अपने अंदर नैतिक मूल्यों, ईमानदारी, सच्चाई, मेहनत जैसे गुण विकसित करने होगें। यदि सभी कर्मचारियों को उनकी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त वेतन दिया जाए तब कहीं जाकर भ्रष्टाचार की नकेल कसी जा सकती है। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं बल्कि पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है जिसे मिलकर ही निभाया जा सकता है।