10वीं कक्षा - हिंदी कविताएँ (पाठ 4 - 6)
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पाठ - 04 (हम राज्य लिए मरते हैं - मैथिलीशरण गुप्त)
हम राज्य लिए मरते हैं।
सच्चा राज्य परन्तु हमारे कृषक ही करते हैं।
जिनके खेतों में है अन्न,
कौन अधिक उनसे सम्पन्न ?
पत्नी-सहित विचरते हैं वे, भव वैभव भरते हैं,
हम राज्य लिए मरते हैं।
व्याख्या: उर्मिला कहती हैं कि हम राज परिवार के लोग राज्य कलह के कारण दुःखी हैं। जबकि वास्तव में सच्चा राज्य हमारे किसान करते हैं। वे स्वयं अपने खेतों में अन्न उत्पन्न करते हैं। इसलिए किसानों से धनवान कोई नहीं। वे अपनी पत्नी संग जीवन यापन करते हैं जबकि हम गृहक्लेश के कारण वियोग सह रहे हैं। अतः किसान हम से अधिक सुखी हैं।
वे गोधन के धनी उदार,
उनको सुलभ सुधा की धार,
सहनशीलता के आगर वे श्रम सागर तरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं।
व्याख्या: उर्मिला किसानों की प्रशंसा करते हुए कहती है कि किसानों के पास अमृत की धारा के समान गाय का दूध सहज ही मिल जाता है। किसान सहनशीलता की मूर्ति हैं। वे सदैव परिश्रम करने में विश्वास रखते हैं जबकि हम राज परिवार के सदस्य राज्य कलह के कारण दुःखी है।
यदि वे करें , उचित है गर्व,
बात बात में उत्सव-पर्व,
हमसे प्रहरी रक्षक जिनके, वे किससे डरते हैं ?
हम राज्य लिए मरते हैं।
व्याख्या: उर्मिला आगे कहती है कि यदि किसान अपने ऊपर गर्व या मान करते हैं तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। उनका ऐसा सोचना बिल्कुल उचित है। वह छोटी-छोटी बातों में खुशी का मौका तलाश लेते हैं। वह प्रतिदिन उत्सव या त्योहार मनाते हैं। जब हम जैसे लोग उनके रक्षक हैं तो उन्हें किसी से भयभीत होने की जरूरत नहीं। जबकि हम राज्य के लिए मरते हैं।
करके मीन मेख सब ओर,
किया करें बुध वाद कठोर,
शाखामयी बुद्धि तजकर वे मूल धर्म धरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं।
व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियों में उर्मिला किसानों के सरल व सादे जीवन की ओर संकेत करते हुए कहती है कि किसान व्यर्थ के वाद-विवाद को त्याग कर धर्म के मूल सिद्धांतों को अपनाते हैं। जबकि विद्वान लोग छोटी-छोटी बात पर बहस करते हैं। जबकि हम राजवंशी राज्य कलह के कारण दुःखी हैं।
होते कहीं वही हम लोग,
कौन भोगता फिर ये भोग ?
उन्हीं अन्नदाताओं के सुख आज दु:ख हरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं।
व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियों में उर्मिला के मन की पीड़ा उजागर होती है। उर्मिला कहती है कि अगर हम राजवंशी न होकर किसान होते तो हमें राज्य कलह के कारण दुःख न सहना पड़ता अर्थात् हम पति-पत्नी में भी वियोग न होता । यदि हम भी किसान ही होते तो राज्य कलह के कष्ट हमें न भोगने पड़ते । उनके सुखों को देखकर हमारे दुःख दूर हो जाते है हैं। लेकिन हम फिर भी राज्य कलह के कारण दुःख भोगते हैं।
पाठ - 05 (गाता खग - सुमित्रानंदन पंत)
गाता खग प्रात: उठकर-
सुंदर, सुखमय जग-जीवन!
गाता खग संध्या-तट पर-
मंगल, मधुमय जग-जीवन।
व्याख्या: कवि प्रकृति के विविध स्वरूपों में से पक्षियों के बारे में बताते हुए कहता है कि पक्षी प्रभात के समय संसार के लोगों के सुंदर, सुखमय और समृद्ध जीवन की कामना के गीत गाता है। संध्या के समय पक्षी नदी के तट पर संसार के प्राणियों के मंगलमय अर्थात् सुखी और आनंद से भरे जीवन की चाह के गीत गाता है।
कहती अपलक तारावलि
अपनी आँखों का अनुभव,
अवलोक आँख आँसू की
भर आतीं आँखें नीरव!
व्याख्या: इन पंक्तियों में तारों की अनेक पंक्तियाँ संसार को एकटक देखते हुए अपनी आँखों का अनुभव बता रही है कि सारे जग का जीवन दुःख, करुणा और विषमता से भरा हुआ है। संसार के लोगों की वेदना देखकर तारों की आँखों में भी आँसू आ जाते हैं। तारों की अनेक पंक्तियाँ अपने आँसू ओस के रूप में बहाती हैं। कवि कहता है कि आँखों की भाषा मौन होती है।
हँसमुख प्रसून सिखलाते
पल भर है, जो हँस पाओ,
अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर जाओ।
व्याख्या: कवि कहता है कि मानव को फूलों से प्रेरणा लेते हुए सदा मुस्कराते रहना चाहिए। मानव का जीवन बहुत छोटा और नाशवान है। यदि हो सके तो मानव को अपने जीवन की विषमताओं और मुश्किलों को दूर करके आनंद और प्रसन्नता से जीवन व्यतीत करना चाहिए। मानव को इस छोटे से जीवन में संसार में आशा और खुशियाँ बाँटकर संसार के आँगन को मुस्कराहट और विश्वास से भर देना चाहिए। अपने सद्गुणों से संसार के वातावरण को भी आनंदित और सुखद बनाना चाहिए। जिस तरह फूल अपना सर्वस्व देकर वातावरण को आनंद से भर देता है उसी तरह मानव को भी अपने सद्गुणों से संसार को समृद्ध बनाना चाहिए।
उठ-उठ लहरें कहतीं यह-
हम कूल विलोक न पाएँ,
पर इस उमंग में बह-बह
नित आगे बढ़ती जाएँ।
व्याख्या: कवि कहता है कि लहरें किनारा पाने की उमंग में निरंतर आगे बढ़ती रहती हैं। कई बार उन्हें किनारा नहीं मिलता और वे रास्ते में ही विलीन हो जाती हैं। लेकिन लहरें फिर से उठती हैं और किनारे की उमंग में फिर से गतिशील हो जाती हैं। कवि कहता है कि लहरों से मानव को प्रेरणा लेनी चाहिए। मानव को असफलता या किसी डर की परवाह किए बिना अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते रहना चाहिए। लक्ष्य प्राप्ति के रास्ते में कितने ही बंधन, रुकावटें क्यों न आ जाएं लेकिन हमें निरंतर परिश्रम करते हुए अपने कदमों को आगे बढ़ाते रहना चाहिए।
कँप कँप हिलोर रह जाती-
रे मिलता नहीं किनारा।
बुद्बुद विलीन हो चुपके
पा जाता आशय सारा।
व्याख्या: कवि कहता है कि सागर में लहरें बार-बार उठ कर किनारा पाने का प्रयास करती हैं। उनमें निरंतर कंपन होता रहता है। रास्ते में ही बिखर जाने के कारण लहरों को किनारा नहीं मिल पाता। इसके विपरीत लहरों के जल से पैदा हुआ बुलबुला अपने जीवन के मकसद को समझता हुआ उसी जल में समा जाता है, जिस से वह पैदा हुआ था। जल के बुलबुले के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य का परमात्मा से मिलन अर्थात परमात्मा में समा जाना ही उसके जीवन का मकसद है।
पाठ - 06 (जड़ की मुस्कान - हरिवंश राय बच्चन)
एक दिन तने ने भी कहा था,
जड़ ?
जड़ तो जड़ ही है ;
जीवन से सदा डरी रही है,
और यही है उसका सारा इतिहास
कि ज़मीन में मुँह गड़ाए पड़ी रही है
लेकिन मैं ज़मीन से ऊपर उठा,
बाहर निकला,
बढ़ा हूँ
मज़बूत बना हूँ,
इसी से तो तना हूँ।
व्याख्या: कवि कहता है कि एक दिन तने ने जड़ के बारे में कहा कि जड़ तो निर्जीव है। वह तो सदा जीवन से डरी रही है और यही उसका इतिहास है कि वह हमेशा ज़मीन में मुँह गड़ा कर पड़ी रही है लेकिन मैं ज़मीन से ऊपर उठकर बाहर निकला हूँ। बड़ा हुआ हूँ और मज़बूत बना हूँ। इसलिए तो मैं तना कहलाता हूँ।
एक दिन डालों ने भी कहा था,
तना ?
किस बात पर है तना ?
जहां बिठाल दिया गया था वहीं पर है बना ;
प्रगतिशील जगती में तिल भर नहीं डोला है,
खाया है, मोटाया है, सहलाया चोला है;
लेकिन हम तने से फूटीं,
दिशा-दिशा में गईं
ऊपर उठीं,
नीचे आईं
हर हवा के लिए दोल बनीं, लहराईं,
इसी से तो डाल कहलाईं।
व्याख्या: कवि कहता है कि एक दिन डालियों ने भी तने के बारे में कहा कि तना किस बात पर घमंड करता है? उसे जहाँ पर बिठा दिया गया था, वह वहीं पर बैठा है। इस प्रगतिशील संसार में वह बिल्कुल भी गतिशील नहीं है। उसने केवल ज़मीन से खुराक लेकर मज़बूत, सुविधाभोगी शरीर बनाया है लेकिन हम तने से ही जन्म लेकर सभी दिशाओं में गईं। कभी ऊपर उठीं, कभी नीचे आईं और हवा में हिली-डुलीं, लहराईं । इसीलिए तो हम डालियाँ कहलाईं।
एक दिन पत्तियों ने भी कहा था,
डाल?
डाल में क्या है कमाल?
माना वह झूमी, झुकी, डोली है
ध्वनि-प्रधान दुनिया में
एक शब्द भी वह कभी बोली है?
लेकिन हम हर-हर स्वर करती हैं
मर्मर स्वर मर्मभरा भरती हैं,
नूतन हर वर्ष हुईं,
पतझर में झर
बहार-फूट फिर छहरती हैं,
वियकित-चित पंथी का
शाप-ताप हरतीं हैं।
व्याख्या: कवि कहता है कि एक दिन पत्तियों ने भी डालियों के सम्बन्ध में कहा कि डालियों में भला क्या विशेषता है? यह बात सत्य है कि वे झूमती, झुकती और हिलती डुलती हैं लेकिन आवाज़ वाली इस दुनिया में क्या कभी उन्होंने एक शब्द भी बोला है? इसके विपरीत हम सदा हर-हर का शब्द बोलती रहती हैं। हमारे आपस में टकराने से वातावरण हमारी खड़खड़ाहट की आवाज़ से भर जाता है। हम हर वर्ष नया स्वरूप प्राप्त कर लेती हैं और पतझड़ में झड़ जाती हैं। बसंत ऋतु आने पर हम फिर से निकल आती हैं और डालियों पर छा जाती हैं। हम थके हुए मन वाले राहगीरों की परेशानियों तथा गर्मी को दूर करके उन्हें शांति प्रदान करती हैं।
एक दिन फूलों ने भी कहा था,
पत्तियां?
पत्तियों ने क्या किया?
संख्या के बल पर बस डालों को छिया लिया,
डालों के बल पर ही चल-चपल रही हैं,
हवाओं के बल पर ही मचल रही हैं
लेकिन हम अपने से खुले, खिले, फूले हैं-
रंग लिए, रस लिए, पराग लिए-
हमारी यश-गंध दूर-दूर-दूर फैली है,
भ्रमरों ने आकर हमारे गुन गाए हैं,
हम पर बौराए हैं।
सबकी सुन पाई है,
जड़ मुसकराई है!
व्याख्या: कवि कहता है कि एक दिन फूलों ने भी पत्तियों के सम्बन्ध में कहा कि पत्तियों ने भला किया ही क्या है अर्थात् पत्तियों में कोई विशेषता नहीं है। पत्तियों ने तो केवल अपनी संख्या के बल पर ही डालियों को ढक लिया है। वे डालियों के बल पर ही हिल-डुल रही हैं और हवाओं के कारण ही मचल रही हैं लेकिन हम फूल स्वयं ही रंग, रस, पराग लेकर खुले, खिले और फूले हैं। हमारे यश की सुगन्ध दूर-दूर तक फैली हुई है। भाँवरे भी आकर हमारे गुणों का गान करते हैं। वे हम पर पागल-से होकर मंडराते रहते हैं। इन सब की बातों को सुनकर जड़ केवल मुस्कराती है क्योंकि वह जानती है कि यदि वह न होती तो तना, डाल, पत्तियाँ और फूल भी न होते। इन सब का अस्तित्व जड़ के कारण ही है।